Saturday, May 28, 2022
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🙏🏼पथ की पहचान 🙏🏼आरक्षी अधीक्षक मनोज कुमार, मध्यप्रदेश


समय ,काल ,देश व परिस्थिति के अनुरूप आध्यात्मिक विधान को आख्यायित करने की परम्परा भारतीय संस्कृति का स्वरूप रहा है पर जो सनातन है ,शाश्वत है उसकी व्याख्या समय की सीमाओं को लांघती हुई कालांतर के साथ स्वरूप में मिल ही जाती है
पतंजलि का अषटांग योग और भगवान बुद्ध का मध्यम अषटांगिक मार्ग तार्किक रूप से एक ही उद्देश्य (स्वतः का ज्ञान) को अवधारित करता है , अष्टांग -योग ,यम ,नियम ,आसन प्राणायाम ,प्रत्याहार ,धारणा ,ध्यान और फिर समाधि की अवस्था की प्राप्ति ईश्वरीय स्थिति को भान कराता है वहीं भगवान महात्मा बुद्ध का मध्यम अषटांगिक मार्ग भी सम्यक दृष्टि ,सम्यक् श्रवण ,सम्यक वाक ,सम्यक् स्मृति ,सम्यक आजीव ,सम्यक् करम ,सम्यक व्यायाम भी सम्यक समाधि की ओर ही पहुँच जाता है
अष्टांग योग का यम और नियम मानसिक प्रसन्नता ,आसन -प्राणायाम ,शारीरिक स्वास्थ्यता , प्रत्याहार और धारणा बौद्धिकता तथा ध्यान, समाधि की आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है इन सभी भावों का समावेश भगवान बुद्ध की अषटांगिक मार्ग से भी आध्यात्मिक अवस्था को ही प्राप्त होते हैं , दोनों चिंतन में साध्य व साधन एक जैसे ही है।

अध्यात्म तो उसी दिन ज्योतित हो गया था जब अंतिम यात्रा को देख मन विह्वल हुआ जा रहा था बोधिसत्व की प्राप्ति तो परिणति थी , साध्य को प्राप्त करने के पथ की पहचान ही आध्यात्मिक प्रकृति का आरम्भण है तभी पतंजलि भी अषटांग योग के प्रारंभ में यम व नियम के माध्यम से पहले पथ की पहचान को समीचीन बताते है । आस्तिक दर्शन भी सांख्य ,योग ,न्याय ,वैशेषिक ,मीमांसा व वेदान्त के माध्यम से प्रकृति -पुरूष , जीवन -मुक्ति जड़ -चेतन ,नीति -अनीति शिव -शैव और अंत में सदगति को ही प्राप्त करता है , इसलिए विधान -देश ,काल और स्थान के अनुसार निर्धारित तो किए गए हैं पर ज्ञानपूंज एक सा प्रतिबिंबित है । बुद्धि, विवेकपूर्ण होकर निर्णय करें तभी जीवन यात्रा का वृत्तान्त सुगम और प्रकाश मान होता है

कलयुग में धर्म को एक बार पुनः परिभाषित करने का समय है ,युग युगान्तर से शास्त्र, वेद उपनिषद व दर्शन द्वारा निर्धारित सत्कर्म को पहचान करने का समय है , और समय है पूर्वजों द्वारा स्थापित परम्पराओं को निभाने का तभी हम समझ पाएँगे कि हम कहाँ से चले थे कहाँ जाना था और कहाँ पहुँच गये(जीवन-मूल्य ) । अतः सम्यक् रूप से सोचना समीचीन होगा कि “पूर्व चलने की बटोही बाट की पहचान कर ले ,यह जीवन का है निर्झर ही मस्ती (अध्यात्म)ही इसका पानी है , इस पार प्रिय तुम ही हो , उस पार न जाने क्या होगा , इसलिए आलोकित पथ करो हमारा हे युग के अंतर्यामी शुभ प्रकाश दो स्वच्छ दृष्टि दो जड़ चेतन सब के स्वामी ।
🙏🏼कर्मयोग ही जीवन आधार है🙏🏼

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