Tuesday, December 6, 2022
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शायद हम मर रहे हैं?

साभार उदय नारायण सिंह लेखक,लोक गायक
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कल एक कुत्ते के पिल्ले को कुचलता एक ट्रक मेरे सामने से गुजर गया।कुछ भी तो नहीं बचा था उस पिल्ले के मृत शरीर में।मैंने ट्रक को जाते हुए देखा पर एक आह भी नहीं निकली।कुछ पल के बाद मेरे मन ने मुझे कटघरे में खड़ा किया और घोषणा की-तुम मर रहे हो!मैंने सर झुकाया और महसूस किया।स्वयं से प्रश्न किया-उस कुत्ते के पिल्ले को कुचलते हुए देख कर मेरे मुंह से आह तक नहीं निकली,मैंने नजदीक जाकर उसे देखा तक नहीं,मैं बस अपने आप में ही लीन रहा,क्या मैं अब संवेदनाशून्य हो गया हूं?
मैं मनुष्य हूं और मेरी तरह आप सभी भी मनुष्य हैं,ईश्वर की एक अनुपम कृति।एकमात्र वैसी कृति,जिसे सोचने और समझने की क्षमता दी है हमारे भगवान ने।सुख में सुखी होना,दुख में दुखी होने जैसी संवेदनाएं दी है उस ने।उस ने हम जैसों को गढ़ते समय यह सोचा होगा कि हम सभी उस की हर कृतियों को सुरक्षित रखेंगें।उस के द्वारा रचित इस पूरे ब्रम्हांड में दृश्य-
अदृश्य,उस के सभीप्रतिनिधि तत्त्वों के संग जुड़ते हुए उपरोक्त दायित्व का निर्वहन करेंगें।पर हम यह कहां आ गये?देखते ही देखते हम सब कब आत्म केंद्रित हो गये,यह कहना मुहाल है।
आज के मानव की श्रेष्ठता का आंकलन उसकी संवेदनशीलता से नहीं होती है बल्कि वह आर्थिक रुप से कितना मजबूत है,उसकी कितनी तूती बोलती है,वह आमजनों पर अपने आतंक को कितना विस्तार दे पाया है, जैसे मुद्दों ने प्रमाण पत्र देना शुरू कर दिया है।हमारा आदर्श हम में ही कहीं जाकर गुम हो गया है।हमने नये मानक निर्धारित कर लिए हैं।अब हमें यह याद नहीं रहा कि हम में,तुम में,खड़ग खंभ में,सब में राम व्याप्त हैं।कभी हम खेतों में चहचहाती चिड़ियों को देख कहा करते थे-राम जी के चिरई,राम जी के खेत,खा लऽ चिरई भर भर पेट।अब हमारे घर में धान के गुच्छे नहीं टंगते,
जहां कभी गौरैय्या का झुंड आ आकर बड़े चाव से धान खाता था।अब मीठु नाम का सुग्गा यदा कदा हीं किसी के आंगन में टंगा दिखता है।अब मैंना का चोंच सोने से गढ़वा देने की बात कोई नहीं करता।
दरवाजे,जो अतिथियों के लिए सर्वदा खुले रहते थे,यहां का नारा हुआ करता था-अतिथि होते हैं भगवान,अब दरवाजों पर लिखा मिलता है-कुत्तों से सावधान।दरवाजों पर जहां गुलाब के पौधों से चौबीसों घंटे फूलों की खुशबू फैली रहती थी,वहां अब कैक्टस के कांटे बो दिये गये हैं।शायद हम सब आधुनिक हो रहें हैं या फिर “मर रहे हैं?हम अब झरनों के संगीत,नदियों की कल-कल,पेड़ के पत्तों की सरसराहट आज भी महसूस कर आनंदित हो रहें हैं क्या?
चिंतन आवश्यक है हम सबों के लिए।यह वह मोड़ है,जहां अगर हमने विचार नहीं किया तो हम तो डूबेंगे हीं, ले डूबेगें तुम्हें भी।अगर सभी डूबे,फिर देश की पहचान मिटेगी और देश भी डूबेगा।एक वक्त आयेगा,जब हम भी रोम और मिस्र जैसे स्थिति में आ जायेंगें-समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का ध्वंसावशेष बन कर।आने वाली पीढ़ियां कहेगी-देखो,यही वो भारत की मृत पड़ी सांस्कृतिक आत्मा है,जो कभी जीवंत थी।
शुभ प्रभात

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