Monday, October 3, 2022
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गणित शिक्षण के उद्देश्य एवं प्राप्ति में गणित अध्यापक की भूमिका

—- नसीम अख्तर, शिक्षक( गणित)
बी बी राम उच्च विद्यालय नगरा, सारण

जैसा कि हम सभी जानते है कि शिक्षा एक उदेश्य आधारित प्रक्रिया है।अर्थात दूसरे शब्दों में कहें तो शिक्षण क्रियाएं कभी भी बिना उद्देश्य के संपादित नहीं की जा सकती है, जिसका निर्धारण समाज द्वारा निर्धारित मान्यताओं एवं मूल्यों के संदर्भ में ही किया जा सकता है। किसी विषय के उद्देश्यों का निर्धारण करते समय मुख्य रूप से राष्ट्र एवं समाज की आवश्यकताएं, विषय की प्रकृति, रीति- रिवाज, परंपराएं तथा मूल्यों को विशेष महत्त्व दिया जाता है। विद्यालय पाठ्यक्रम में प्रत्येक विषय का अपना अलग स्थान तथा महत्त्व होता है। ज्ञात्व्य हो की मानव जीवन में कोई कार्य क्यों किया जाता है — भारतीय दर्शन में इसे मोक्ष या आनंद कहा गया है। गणित विषय का अध्ययन या शिक्षण भी अपनी चरम सीमा पर प्राप्त होने लगता है जिसे मोक्ष या आनंद की प्राप्ति होना कहा जाता है। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग-योग में यम, नियम,आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारणा, समाधि से मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग बताया है। हमारा साधन कोई भी हो सकता है गणित से भी हम ध्यान, धारणा, समाधि अर्थात् आनंद की स्थिति का अनुभव कर सकते है जिसे ऋषि- मुनियों ने अनुभव और तप के आधार पर बताया है। प्राचीन काल में गणित के अध्ययन का मुख्य उद्देश्य केवल मात्र दैनिक जीवन में काम आने वाले ज्ञान से ही संबंधित था तथा इसका क्षेत्र भी सीमित था, परन्तु वर्तमान में गणित को विभिन्न मूल्यों( Values)में परिवर्तन होने के कारण माध्यमिक स्तर तक अनिवार्य विषय के रूप में स्वीकार किया जा रहा है क्योंकि हमारा सामाजिक ढांचा भी गणित पर आधारित है।
अतः मूल्यों के प्राप्ति के आधार पर गणित शिक्षण के निम्नलिखित उद्देश्य है —

  1. बौद्धिक उद्देश्य
  2. प्रयोगात्मक उद्देश्य
  3. नैतिक उद्देश्य
  4. अनुशासन सम्बन्धी उद्देश्य
  5. सामाजिक उद्देश्य
  6. जीवकोपार्जन सम्बन्धी उद्देश्य
  7. सांस्कृतिक उद्देश्य
  8. कलात्मक उद्देश्य
  9. वैज्ञानिक दृष्टिकोण सम्बन्धी उद्देश्य
  10. अंतर्राष्ट्रीय उद्देश्य
    11.आनन्द प्राप्ति एवं अवकाश के सदुपयोग का उद्देश्य

उद्देश्यों की प्राप्ति में गणित अध्यापक की भूमिका —

गणित शिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु एक अध्यापक निम्न प्रकार से छात्र- छात्राओं को सहायता प्रदान कर सकता है –

  1. छात्र- छात्राओं में स्वच्छता, स्पष्टता, नियमितता, कठिन परिश्रम तथा अनुशासन आदि गुणों विकास करना
  2. गणित के इतिहास एवं गणितज्ञों की जीवनी से छात्र- छात्राओं को परिचित कराना
  3. उपयुक्त शिक्षण विधियों का प्रयोग करना
  4. सृजनात्मक तथा क्रियात्मक अनुभव प्रदान करना
  5. गणित के ज्ञान को दैनिक तथा व्यवहारिक जीवन से संबंधित कराना
  6. सभी छात्र- छात्राओं के साथ निष्पक्ष, प्रेम तथा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना
  7. मानसिक विकास हेतु पर्याप्त अवसर प्रदान करना
  8. सहायक शिक्षण समग्री को आवश्यकता अनुसार प्रयोग में लाना
  9. गृहकार्य एवं कक्षाकार्य को नियमित जांच करना
  10. मूल्यांकन हेतु उचित एवं नवीन प्रविधियों के प्रयोग करना आदि।
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